Dard kagaj pe

*दर्द कागज़ पर,*
*मेरा बिकता रहा,*

*मैं बैचैन था,*
*रातभर लिखता रहा..*

*छू रहे थे सब,*
*बुलंदियाँ आसमान की,*

*मैं सितारों के बीच,*
*चाँद की तरह छिपता रहा..*

*अकड होती तो,*
*कब का टूट गया होता,*

*मैं था नाज़ुक डाली,*
*जो सबके आगे झुकता रहा..*

*बदले यहाँ लोगों ने,*
*रंग अपने-अपने ढंग से,*

*रंग मेरा भी निखरा पर,*
*मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..*

*जिनको जल्दी थी,*
*वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,*

*मैं समन्दर से राज,*
*गहराई के सीखता रहा..!!*

*”ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट…*
*तू गुमान न कर…*

*बुलंदियाँ छू हज़ार, मगर…*
*उसके लिए कोई ‘गुनाह’ न कर.*

*कुछ बेतुके झगड़े*,
*कुछ इस तरह खत्म कर दिए मैंने*

*जहाँ गलती नही भी थी मेरी*,
*फिर भी हाथ जोड़ दिए मैंने*

Betiya shubhkamnaye hai

बेटियां शुभकामनाएं हैं,
बेटियां पावन दुआएं हैं।
बेटियां जीनत हदीसों की,
बेटियां जातक कथाएं हैं।
बेटियां गुरुग्रंथ की वाणी,
बेटियां वैदिक ऋचाएं हैं।
जिनमें खुद भगवान बसता है,
बेटियां वे वन्दनाएं हैं।
त्याग, तप, गुणधर्म,
साहस कीबेटियां गौरव कथाएं हैं।
मुस्कुरा के पीर पीती हैं,
बेटी हर्षित व्यथाएं हैं।
लू-लपट को दूर करती हैं,
बेटियाँ जल की घटाएं हैं।
दुर्दिनों के दौर में देखा,
बेटियां संवेदनाएं हैं।
गर्म झोंके बने रहे बेटे,
बेटियां ठंडी हवाएं हैं।

Samandar ishq ka

*तूने देखी कहाँ,…..मेरी चाहतों की… दुनियां,…..*

*समंदर इश्क़ का,…..तेरे लिए …..अभी सूखा नहीं है …..*

chehra mera 

​चेहरा मेरा था, निगाहें उस की

ख़ामुशी में भी वो बातें उस की
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं

शेर कहती हुई आँखें उस की
शोख़ लम्हों का पता देने लगीं

तेज़ हुई हूई सांसें उस की
ऐसे मौसम भी गुज़ारे हम ने

सुबहें जब अपनी थीं शामें उस की
ध्यान में उस के ये आलम था कभी

आँख महताब की, यादें उस की
रंग जोइनदा वो, आए तो सही!

आँख महताब की, यादें उस की
फ़ैसला मौज-ए-हवा ने लिखा!

आंधीयां मेरी ,बहारें उस की
ख़ूद पे भी खुलती ना हो जिस की नज़र

जानता कौन ज़बानें उस की
नींद इस सोच से टूटी अक्सर

किस तरह कटती हैं रातें उस की
दूर रह कर भी सदा रहती हैं

मुझ को थामे हूए बाहें उस की

dosti , yaari

​साथ साथ जो खेले थे बचपन में 
वो सब दोस्त अब थकने लगे है
किसीका पेट निकल आया है
किसीके बाल पकने लगे है
सब पर भारी ज़िम्मेदारी है
सबको छोटी मोटी कोई बीमारी है
दिनभर जो भागते दौड़ते थे
वो अब चलते चलते भी रुकने लगे है
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
किसी को लोन की फ़िक्र है
कहीं हेल्थ टेस्ट का ज़िक्र है
फुर्सत की सब को कमी है
आँखों में अजीब सी नमीं है
कल जो प्यार के ख़त लिखते थे
आज बीमे के फार्म भरने में लगे है
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
देख कर पुरानी तस्वीरें
आज जी भर आता है
क्या अजीब शै है ये वक़्त भी
किस तरहा ये गुज़र जाता है
कल का जवान दोस्त मेरा
आज अधेड़ नज़र आता है
कल के ख़्वाब सजाते थे जो कभी
आज गुज़रे दिनों में खोने लगे है 
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
😌😌😊😊😊