एक  विवाहित बेटी का पत्र उसकी माँ के नाम

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

अब मेरी सुबह 6 बजे होती है और रात 12 बज जाती है,

             तब

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

सबको गरम गरम परोसती हूँ, और खुद ठंढा ही खा लेती हूँ,

                   तब

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

जब कोई बीमार पड़ता है तो
एक पैर पर उसकी सेवा में लग जाती हूँ,

और जब मैं बीमार पड़ती हूँ
तो खुद ही अपनी सेवा कर लेती हूँ, तब

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

जब रात में सब सोते हैं,
बच्चों और पति को चादर ओढ़ाना नहीं भूलती,

और खुद को कोई चादर ओढाने वाला नहीं,

                  तब

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

सबकी जरुरत पूरी करते करते खुद को भूल जाती हूँ,
खुद से मिलने वाला कोई नहीं, तब

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

यही कहानी हर लड़की की शायद शादी के बाद हो जाती है

कहने को तो हर आदमी शादी से पहले कहता है

“माँ की याद तुम्हें आने न दूँगा”

पर, फिर भी क्यों?

“माँ तुम बहुत याद आती हो”

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Vo apne

वो अपने ही होते हैं जो लफ्जों से मार देते हैं…..
वरना गैरों को क्या खबर के दिल किस बात पे
दुखता ह

Nazro ke tir

उनकी नज़रों के तीर—-> तो बस
हमारी जान लेने का बहाना था,,!
दिल (¯`v´¯)
        `•.¸.•´ हमारा बिखर गया तो वो बोली वाह!
क्या निशाना था
💖💘💞💘💖💘💞💘💖

Har hosle ko ajmana chahta hu

होंसले को आजमाना चाहता हूँ।
इक नया जोखिम उठाना चाहता हूँ ।

कामयाबी देखना मिलकर रहेगी ,
मुश्किलों को बस हराना चाहता हूँ ।

वह गजल लिखकर रहूंगा जिंदगी की ,
जो लबों पर गुनगुनाना चाहता हूँ ।

अब उदासी को कहीं जाना पडेगा ,
मैं खुशी से घर सजाना चाहता हूँ ।

मैं बढूंगा जोश लेकर हर कदम ही ,
रास्तों को मैं थकाना चाहता हूँ।

साथ मेरा दे न दे कोई भले ही ,
हमसफ़र खुद को बनाना चाहता हूँ ।

मुश्किलों का सामना हंसकर करूंगा ,
मंजिलों का सर झुकाना चाहता हूँ ।

Ummed ki dhal liye betha hu

उलझनों और कश्मकश में,
उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ।

ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए,
मैं दो चाल लिए बैठा हूँ |

लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख – मिचोली का।
मिलेगी कामयाबी, हौसला कमाल का लिए बैठा हूँ l

चल मान लिया, दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक़।
गिरेबान में अपने, ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ l

ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हे मुबारक।

मुझे क्या फ़िक्र, मैं कश्तीया और दोस्त बेमिसाल लिए बैठा हूँ।