dosti yaari 

​*तुम मुझसे दोस्ती का मोल ना पूछना कभी…*
*तुम्हें किसने कहा की पेड़ छाँव बेचते हैं…….?”*

chehra mera 

​चेहरा मेरा था, निगाहें उस की

ख़ामुशी में भी वो बातें उस की
मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गईं

शेर कहती हुई आँखें उस की
शोख़ लम्हों का पता देने लगीं

तेज़ हुई हूई सांसें उस की
ऐसे मौसम भी गुज़ारे हम ने

सुबहें जब अपनी थीं शामें उस की
ध्यान में उस के ये आलम था कभी

आँख महताब की, यादें उस की
रंग जोइनदा वो, आए तो सही!

आँख महताब की, यादें उस की
फ़ैसला मौज-ए-हवा ने लिखा!

आंधीयां मेरी ,बहारें उस की
ख़ूद पे भी खुलती ना हो जिस की नज़र

जानता कौन ज़बानें उस की
नींद इस सोच से टूटी अक्सर

किस तरह कटती हैं रातें उस की
दूर रह कर भी सदा रहती हैं

मुझ को थामे हूए बाहें उस की

dosti , yaari

​साथ साथ जो खेले थे बचपन में 
वो सब दोस्त अब थकने लगे है
किसीका पेट निकल आया है
किसीके बाल पकने लगे है
सब पर भारी ज़िम्मेदारी है
सबको छोटी मोटी कोई बीमारी है
दिनभर जो भागते दौड़ते थे
वो अब चलते चलते भी रुकने लगे है
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
किसी को लोन की फ़िक्र है
कहीं हेल्थ टेस्ट का ज़िक्र है
फुर्सत की सब को कमी है
आँखों में अजीब सी नमीं है
कल जो प्यार के ख़त लिखते थे
आज बीमे के फार्म भरने में लगे है
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
देख कर पुरानी तस्वीरें
आज जी भर आता है
क्या अजीब शै है ये वक़्त भी
किस तरहा ये गुज़र जाता है
कल का जवान दोस्त मेरा
आज अधेड़ नज़र आता है
कल के ख़्वाब सजाते थे जो कभी
आज गुज़रे दिनों में खोने लगे है 
उफ़ क्या क़यामत हैं
सब दोस्त थकने लगे है
😌😌😊😊😊

maa ka aanchal 

​माना सजना प्यारे हैं पर उससे पहले भी दुनिया थी 

पापा की उंगली थामे कभी तू छुटकी मुनिया थी 

गुड्डे-गुड्डी का खेल तुझे भी जग में सबसे प्यारा था

भाई कोने में सिसक रहा जो कभी आँख का तारा था

इन्द्रधनुषी ख़्वाबों की खातिर सारे रिश्ते तोड़ चली तू 

बाहों के बंधन के लिए माँ का आंचल छोड़ चली तू 

रही सही स्मृतियाँ भी इक पल में बिसर जायेगी

जिस दिन डोली में बैठकर तू पिया के घर जायेगी

दुवा है कि होठों पर तेरे ये हंसी सदा ही आबाद रहे 

खुशियाँ तेरे चरण दबाए तू सदियों जिंदाबाद रहे 

तेरे आंगन कुबेर लगाये धन दौलत के झाड़ अनेक 

कोई पलकों पर बैठाये मिलते रहे तुझे लाड़ अनेक 

हरपल तेरी धड़कन में रंग रसिया के गीत गूंजे 

चूड़ियों की खनखन में तेरे सपनों का मीत गूंजे 

काजल के काले घेरे में केवल प्रियतम का वास रहे 

और कोई हो न हो मगर वो हरदम तेरे पास रहे 

नथनी की चमचम के आगे कांटे की क्या बिसात रहे 

यूँ ही खिलखिल करते तेरे दुधिया दुधिया दांत रहे 

अपने मन को और किसी के मन से जोड़ चली तू 

इन्द्रधनुषी ख़्वाबों की खातिर सारे रिश्ते तोड़ चली तू 

बाहों के बंधन के लिए माँ का आंचल छोड़ चली तू 

पुरानी गलियाँ आवाज लगाये तो राह बदल लेना 

नये जीवन के नये मौज में मस्ती से ढल लेना 

पागल लोग यूँ ही आंसुओं के धारे बहाया करते हैं 

खुद दुखी हैं तो मूर्ख दुनिया को सताया करते हैं 

इनसे बेपरवाह होकर तू गीत मिलन के गाती जा

पहन बिछिया, लगा बिंदिया कंगन खनकाती जा 

आसमान से आगे जाने को लगाकर होड़ चली तू 

इन्द्रधनुषी ख़्वाबों की खातिर सारे रिश्ते तोड़ चली तू 

बाहों के बंधन के लिए माँ का आंचल छोड़ चली तू

bachpan

​उम्र ने तलाशी ली, 

तो जेबों से लम्हे बरामद हुए..
कुछ ग़म के, 

कुछ नम थे, 

कुछ टूटे, 
बस कुछ ही सही सलामत मिले 
“जो बचपन के थे..”

Thoda sabra kar

​अच्छे दिन बदल गए,

तो बुरे दिन भी बदल जाएँगे …

थोड़ा धीरज रख तू,

सारे हालात संभल जाएँगे …
या तो बरस जाने दे बादल,

या हवा का इन्तजार कर शांति से …

असीमित गम के बादल,

सुख की धूप में टल जाएँगे …
धरती घूमती है हमेशा,

और मौसम बदलते रहते हैं यूँ ही …

तपते, जलाते, गर्म, सर्द,

सब दिन और मौसम बदल जाएँगे …
दरवाजा बंद कर,

और बिना आवाज थोड़ा रो ले …

आंसुओं के साथ,

सब दुःख दर्द पिघल जाएँगे …
पितृपक्ष में मांग माफ़ी पितरों से,

देवों से, दोस्तों और दुशमनों से भी …

सबका भला कर,

तेरे पुण्य कर्म तेरी खुशियों में ढ़ल जाएँगे॥