Jab beti ghar se vida ho jayegi

ये घर दरो दीवार सब तरसेंगे
जब बर्तन खन खन खनकेंगे
सारे पकवान फ़ीके पड़ जायेंगे
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
बात बात पर उसका नाम
मेरी जुबां पे कभी तेरी जुबां पे
सांसें बहन की अटकी रह जायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
वो जो दिन भर लडता था भैय्या
पापा जिसको धमकाते थे
ताकेगा दीवारों को चुपचाप
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
फ़ूलों की रंगत तब कैसी होगी
खुश्बू भी फ़िर न सुहायेगी
चिड़ियों की चहक भी रुलायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी
बागीचे की गिलहरी क्या भूखी होगी
गमलों में डालेगा अब कौन पानी
क्यारी अब सूखी हो जायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
दादा की चाय की प्याली
भरी भी लगेगी अब खाली
दादी गुम सुम हो जायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
तेरी सहेलियों की वो सारी बातें
कमरे से आती हंसने की आवाज़ें
मुंडेर की बुल बुल चुप हो जायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
घर से दफ़्तर अब दूर होगा
मेरा सेहन अब सूना होगा
शायद ज़हन भी अब गीला होगा
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी.
रख कर सिर पर बेटी के हाथ
बस , ये बाप दुआ देता रह जायेगा
माँ बिलखती हुई रह जायेगी
जब बेटी घर से विदा हो जायेगी

Aaj braj mai holi hai

बरसाने बरसन लगी, नौ मन केसर धार ।
ब्रज मंडल में आ गया, होली का त्‍यौहार ।।

लाल हरी नीली हुई, नखरैली गुलनार ।
रंग-रँगीली कर गया, होली का त्‍यौहार ।।

आंखों में महुआ भरा, सांसों में मकरंद ।
साजन दोहे सा लगे, गोरी लगती छंद ।।

कस के डस के जीत ली, रँग रसिया ने रार ।
होली ही हिम्‍मत हुई, होली ही हथियार ।।

हो ली, हो ली, हो ही ली, होनी थी जो बात ।
हौले से हँसली हँसी, कल फागुन की रात ।।

होली पे घर आ गया, साजणियो भरतार ।
कंचन काया की कली, किलक हुई कचनार ।।

केसरिया बालम लगा, हँस गोरी के अंग ।
गोरी तो केसर हुई, साँवरिया बेरंग ।।

देह गुलाबी कर गया, फागुन का उपहार ।
साँवरिया बेशर्म है, भली करे करतार ।।

बिरहन को याद आ रहा, साजन का भुजपाश।
अगन लगाये देह में, बन में खिला पलाश ।।

साँवरिया रँगरेज ने, की रँगरेजी खूब ।
फागुन की रैना हुई, रँग में डूबम डूब।।

सतरंगी सी देह पर, चूनर है पचरंग ।
तन में बजती बाँसुरी, मन में बजे मृदंग ।।

जवाकुसुम के फूल से, डोरे पड़ गये नैन ।
सुर्खी है बतला रही, मनवा है बेचैन ।।

बरजोरी कर लिख गया, प्रीत रंग से छंद ।
ऊपर से रूठी दिखे, अंदर है आनंद ।।

होली में अबके हुआ, बड़ा अजूबा काम ।
साँवरिया गोरा हुआ, गोरी हो गई श्‍याम ।।

कंचन घट केशर घुली, चंदन डाली गंध ।
आ जाये जो साँवरा, हो जाये आनंद ।।

घर से निकली साँवरी, देख देख चहुँ ओर ।
चुपके रंग लगा गया, इक छैला बरजोर ।।

बरजोरी कान्‍हा करे, राधा भागी जाय ।
बृजमंडल में डोलता, फागुन है गन्नाय ।।

होरी में इत उत लगी, दो अधरन की छाप ।
सखियाँ छेड़ें घेर कर, किसका है ये पाप ।।

कैसो रँग डारो पिया, सगरी हो गई लाल ।
किस नदिया में धोऊँ अब, जाऊँ अब किस ताल ।।

फागुन है सर पर चढ़ा, तिस पर दूजी भाँग ।
उस पे ढोलक भी बजे, धिक धा धा, धिक ताँग ।।

हौले हौले रँग पिया, कोमल कोमल गात ।
काहे की जल्‍दी तुझे, दूर अभी परभात ।।

फगुआ की मस्‍ती चढ़ी, मनुआ हुआ मलंग ।
तीन चीज़ हैं सूझतीं, रं�

Naseeb

जरुर कोई तो लिखता होगा इन
कागज और पत्थर का नसीब…,

वरना ये मुमकिन नहीं की कोई
पत्थर ठोकर खाए और कोई
पत्थर भगवान बन जाए…,

और कोई कागज़ रद्दी और कोई
कागज़ गीता और कुरान बन जाए…!!!

Sas bahu ki marwadi kavita

सास बहु की मारवाड़ी कविता:

मत कर सासु बेटो बेटों
ओ तो मिनख हमारो है

जद पहनतो बाबा सूट
जद ओ गुड्डू थारो हो

अब ओ पहरे कोट पेंट.  
अब ओ डार्लिंग म्हारो है

जद ओ पीतो बोतल में दूध
जड़ ओ गिगलो थारो हो

अब पीवे गिलास में जूस
अब ओ मिस्टर म्हारो है

जद ओ लिखतो क ख ग
जद ओ नानको थारो हो

अब ओ करे watsapp sms
अब ओ जानू म्हारो है

जद ओ खातो चोकलेट आइस क्रीम
जद ओ टाबर थारो हो

अब ओ खावे पिज़्ज़ा बिस्कुट
अब ओ हब्बी म्हारो है

जद ओ जातो स्कुल कोलेज
जद ओ मुन्नो थारो हो

अब ओ जाए ऑफिस में
अब ऑफिसर म्हारो है

जद ओ मांगतो पोकेट खर्चो
जद ओ लाडलो थारो हो

अब ओ ल्यावे लाखां रूपिया
अब ओ ए टी एम म्हारो है

मत कर सासू डीकरो डीकरो
अब ओ छैलो म्हारो है

Father

जब
मम्मी
डाँट रहीं थी
तो
कोई चुपके से
हँसा रहा था,
वो थे पापा. . .
.
जब
मैं सो रहा था
तब कोई
चुपके से
सिर पर हाथ
फिरा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
जब
मैं सुबह उठा
तो
कोई बहुत
थक कर भी
काम पर
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
खुद
कड़ी धूप में
रह कर
कोई
मुझे ए.सी. में
सुला रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
सपने
तो मेरे थे
पर उन्हें
पूरा करने का
रास्ता
कोई और
बताऐ
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
मैं तो
सिर्फ
अपनी
खुशियों में
हँसता हूँ,
पर
मेरी हँसी
देख कर
कोई
अपने गम
भुलाऐ
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
फल
खाने की
ज्यादा
जरूरत तो
उन्हें थी,
पर
कोई मुझे
सेब
खिलाए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
खुश तो
मुझे होना चाहिए
कि
वो मुझे मिले ,
पर
मेरे
जन्म लेने की
खुशी
कोई और
मनाए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
ये दुनिया
पैसों से
चलती है
पर
कोई
सिर्फ मेरे लिए
पैसे
कमाए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
घर में सब
अपना प्यार
दिखाते हैं
पर
कोई
बिना दिखाऐ भी
इतना प्यार
किए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
पेड़ तो
अपना फल
खा नही सकते
इसलिए
हमें देते हैं…
पर
कोई
अपना पेट
खाली रखकर भी
मेरा पेट
भरे जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
मैं तो
नौकरी के लिए
घर से बाहर
जाने पर
दुखी था
पर
मुझसे भी
अधिक
आंसू
कोई और
बहाए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .
.
मैं
अपने
“बेटा ” शब्द को
सार्थक
बना सका
या नही..
पता नहीं…
पर
कोई
बिना स्वार्थ के
अपने
“पिता” शब्द को
सार्थक
बनाए
जा रहा था ,
वो थे पापा. . .

Maine har roz jamane ko

मैंने .. हर रोज .. जमाने को .. रंग बदलते देखा है ….
उम्र के साथ .. जिंदगी को .. ढंग बदलते देखा है .. !!

वो .. जो चलते थे .. तो शेर के चलने का .. होता था गुमान..
उनको भी .. पाँव उठाने के लिए .. सहारे को तरसते देखा है !!

जिनकी .. नजरों की .. चमक देख .. सहम जाते थे लोग ..
उन्ही .. नजरों को .. बरसात .. की तरह ~~ रोते देखा है .. !!

जिनके .. हाथों के .. जरा से .. इशारे से .. टूट जाते थे ..पत्थर ..
उन्ही .. हाथों को .. पत्तों की तरह .. थर थर काँपते देखा है .. !!

जिनकी आवाज़ से कभी .. बिजली के कड़कने का .. होता था भरम ..
उनके .. होठों पर भी .. जबरन .. चुप्पी का ताला .. लगा देखा है .. !!

ये जवानी .. ये ताकत .. ये दौलत ~~ सब कुदरत की .. इनायत है ..
इनके .. रहते हुए भी .. इंसान को ~~ बेजान हुआ देखा है … !!

अपने .. आज पर .. इतना ना .. इतराना ~~ मेरे .. यारों ..
वक्त की धारा में .. अच्छे अच्छों को ~~ मजबूर हुआ देखा है .. !!! 

कर सको……तो किसी को खुश करो……दुःख देते ……..तो हजारों को देखा है..:)